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अपने अंदर के ‘सहिया’ को जगाइए

हमारे आदिवासी भाषा में ‘हिया’ का अर्थ प्रिय होता है। सहिया एक स्वैच्छिक समाजिक संबंध है जो दो गाँव के परिवार या दो टोला के परिवार को स्नेह के साथ दायित्वों के बंधन में बांधता है। ‘सहिया जोड़ाना’ एक समाजिक प्रक्रिया है। एक समान शर्त होती है कि दोनो परिवार में संतान की संख्या एक हों। सहिया जोड़ाना का एक और प्रारूप है जिसके अंतर्गत एक आदिवासी परिवार निकटतम ग़ैर आदिवासी परिवार के साथ समाजिक संबंध स्थापित करता है। यह एक समाजिक समरसता का परिचायक है।

झारखंड जैसे राज्य में हमेशा से एक शीत युद्ध ‘वो लोग’ और ‘हमलोग’ के बीच रहा है। ग़ैर आदिवासी समाज को हम एक चालक और कूटनीतिज्ञ समाज के अंतर्गत चेतन-अचेतन मन से वर्गीकृत कर देते हैं। आदिवासी समाज का अनुभव कड़वा रहा है, इसलिए बहुत हद तक इसे हम सही भी कह सकते हैं। अपने समाज के बाहर के व्यक्ति के लिए दिकु का संज्ञा दिया जाता है। ‘दिकु’ शब्द किसी अन्य समाज का शोषण करने वाले व्यक्ति को कहा गया है। आदिवासी समाज सदियों से ठगा जाता रहा है और आज भी ठगा जा रहा है। यदि हम इस समस्या के मूल जड़ को अब भी समझने का प्रयास नहीं करेंगे तो यह निरंतर चलता रहेगा।

एक ग़ैर आदिवासी समाज को हम संशय की दृष्टि से देखते हैं। अनेक सकारात्मक- नकारात्मक विशेषण से उन्हें अलंकृत करते हैं। जिसे आप ग़ैर आदिवासी समाज के अवगुण मान रहे हैं वह शायद ‘उस समाज के लिए गुण हो सकता है। बिना दोषारोपण के भी लकीर लम्बी खींची जा सकती है। इस बात पर विचार कीजिएगा। वह समाज इतना संगठित क्यों है और आपका आदिवासी समाज क्यों नहीं? वह इतना चालक क्यों है और आप क्यों नहीं? वह इतना विद्वान क्यों है और आप क्यों नहीं? वह शिक्षा को इतना महत्व क्यों देता है और आप क्यों नहीं? वह सजग क्यों है और आप क्यों नहीं? उनमें भी आपसी मतभेद है किंतु आवश्यकता के समय सभी एकजुट हो जाते हैं, आप क्यों नहीं? उपरोक्त तुलना का अर्थ यह बिल्कुल भी नहीं है कि आप किसी की छाया-प्रति बनें। किसी भी समाज को यदि समझना है तो उसके बारे पढ़ना होगा, जानना होगा। उनके अच्छाइयों को आत्म-साथ कीजिए। जो बुराइयाँ हैं उसे दूर रखें।

परिवर्तन की गति जब तेज हो तो आपको भी गतिमान होना होगा। कहने का अर्थ यह है कि पहले आदिवासी जीवन एक गाँव के सीमा के अंदर परिपूर्ण था। उस काल में हमारा रहन सहन, शासन, संस्कृति, व्यवहार उसी गाँव-संसार के अंदर था। पर अब ऐसा नहीं है। अब जब हम एकल समाज से हटकर, बहु समाज में स्थित हो गए हैं तो अनुकूलनता बनाए रखने के लिए, सार्थक परिवर्तन अपनाने ही होंगे।

हम अपने अंदर भी झांकने का प्रयास करें। क्या स्वयं हमारे आदिवासी समाज के भीतर ‘दिकु’ नहीं हैं? हमारे आदिवासी समाज में भी अनेक विसंगतियाँ हैं। हाल में ही विश्वविद्यालय के अंतिम वर्ष के छात्र से साक्षात्कार के दौरान मैंने प्रश्न पूछा – सोहराई क्यों मनाते हैं? ‘सर जमीन बचाने के लिए’। जवाब सुन कर मैं स्तब्ध था। जो कल हेहल बस्ती या घाघरा बस्ती था आज वह ‘फलाँ कॉलोनी’ हो गया है। पाँचवीं अनुसूची और सीएनटी क्षेत्रों में जमीन का जो हस्तांतरण हो रहा है क्या वह बिना हमारे लोगों के मिलीभगत के बिना संभव है?

जितना हुजूम सरहुल शोभायात्रा में निकलता है वह हुजूम अपने अधिकार के लिए क्यों नहीं निकलता? आदिवासी संघर्ष में ऐसा क्यों है कि पहली पंक्ति में हमेशा लाल पाड़ साड़ी पहने, पीठ में नन्हे को बेतरा कर के ग्रामीण महिलाएँ अधिकार के लिए मुखर होती हैं। हम जैसे शहरी आदिवासी इस से दरकिनार रहते हैं। शारीरिक, वैचारिक एवं आर्थिक उपस्थिति ठेठ शून्य। लेकिन आरक्षण का लाभ सबसे पहले हम लेते हैं, उनका क्या, जो ‘हार जोत’ कर पढ़ाई कर रहा है। ऐसे में क्या हम भीतरी दिकु नहीं हैं।

क्या आदिवासी समाज में आंतरिक जातिवाद नहीं है? बिल्कुल है। मैंने खुद अनुभव किया है। मुझे भोजन की पंक्ति से यह बोलकर उठा दिया गया था क्योंकि मैं उस कुटुम्ब का नहीं था। मुंडा का उराँव से नहीं बनता है। उराँव का किसी अन्य के साथ सामंजस्य नहीं है। फिर करेले पर नीम चढ़ा, धार्मिक लड़ाई का कोण। मैं यह बिल्कुल नहीं कह रहा कि जो सांस्कृतिक विशिष्टता है उसे शून्य किया जाए। मुंडा, उराँव, संथाल, हो, खड़िया तथा अन्य सभी आदिवासी समुदाय अपनी व्यक्तिगत सांस्कृतिक-सामाजिक पहचान और विशिष्टता को अवश्य बनाए रखें किंतु जब कोई विपदा सामूहिक आती है तो हम एकजुट होना नहीं जानते हैं। जल जंगल ज़मीन की कोई जात नहीं होती, यह लड़ाई तो सबके लिए समान है। सादरी में एक कहावत है-आपन घर कर… बरियार। हम आपसी लड़ाई में ही कागज़ी शेर हैं। बाहरी लड़ाई लड़ पाने में हम असमर्थ हैं। इसलिए अपने अंदर के ‘सहिया’ को जगाइए।

हम कान के भी बहुत कच्चे होते हैं। तुरंत धारणा बना लेते हैं। स्वयं का समाजिक योगदान कितना है उसका पता नहीं, किंतु कौन सा कार्य, कौन कितना गलत कर रहा है उसके बारे में विशेषज्ञ हैं। ऐसा भी नहीं है कि हमारे आदिवासी समाज में अच्छे राजनेता नहीं हैं। किंतु माननीय भी कहते हैं कि- “आदिवासी समाज के लिए इतना करने के बावजूद, देखिएगा कोई आ कर उन्हें बरगला देगा तो वे उधर ही चल पड़ेंगे। इसीलिए संतुलन बनाए रखने के लिए राजनैतिक समझौते करने पड़ते हैं”। आदिवासी समाज में राजनैतिक चेतना आज की बहुत बड़ी आवश्यकता है।

एक चीज को बारीकी से समझने की आवश्यकता है। आदिवासी समुदाय वर्तमान में अनेक मोर्चे पर संघर्षरत है। यह मैं समाज के लिए सोचने के लिए छोड़ना चाहता हूँ। यहाँ संघर्ष दो प्रकार के हैं। एक जो समाज ने स्वयं आंतरिक रूप से महसूस किया और किसी चुनौती के कारण उत्पन्न हुआ है और दूसरा, जिसे किसी ने बड़ी चालाकी से हम पर थोप दिया है ताकि हम अपने मूल संघर्ष से भटक जाएँ। आप स्वयं से या समाजिक अगुवा से पूछिए कि यदि शिक्षा, धर्म कोड, नशाबंदी, जल जंगल ज़मीन, भाषा संस्कृति, रोज़गार के लिए संघर्ष है तो उससे समाज को क्या लाभ होगा? और यह भी कि यह कितना आवश्यक है? अधिकांश समय यह महसूस होता है कि इन संघर्षों के तकनीकी बारीकियों से हम अनभिज्ञ होते हैं। जब तर्क लगाएँगे तो आप स्वयं आँकलन कर सकेंगे कि आपके सूची में कौन सा संघर्ष प्राथमिकता पर होना चाहिए। जब संघर्षों के संभावित परिणाम का सही आँकलन होगा तो प्रयास और परिश्रम दोनो सफल होंगे।

एक और समूह है जो वर्तमान आदिवासी समुदाय के ‘सहिया’ हैं। माय माटी के अंक में ‘हाशिए पर गाँव… आदिवासी समाज’, लेख प्रकाशित हुई थी और प्रभात खबर से विनय जी का फ़ोन आया। वे भावुक थे। उनकी आवाज में पीड़ा थी। कहा, अपने लम्बे पत्रकारिता में क्षेत्र भ्रमण के दौरान इन्हीं सब चुनौतियों को उन्होंने भी बारीकी से देखा था। ऐसे अनेक हैं जो आदिवासी समुदाय से नहीं हैं किंतु ऐसा नहीं है कि वो आदिवासी समुदाय के विषय में सोचते बोलते नहीं हैं।

ऐसा नहीं है कि सभी ग़ैर आदिवासी आपके विरोधी हैं। इस टिप्पणी से मेरे ही समाज में प्रबल विरोध होगा पर फिर भी मैं दृढ़ता से अपनी बात रखूँगा। मैं एक महत्वपूर्ण तथ्य को आप सबके चर्चा के लिए सामने लाना चाह रहा हूँ। ‘सहिया’ शीर्षक को बहुत सोच समझ कर मैंने चयन किया है। वैसे ग़ैर आदिवासी जो आपके विषय में चिंतन करते हैं, आपके लिए आवाज उठाते हैं, आपके उत्थान के लिए निरंतर प्रयासरत हैं, वो अब आपके समाज के लिए बोलने, लिखने, संघर्ष या समाज सुधारक प्रयास करने से हिचकने लगे हैं। ऐसे अनेक शिक्षाविद, समाजिक कार्यकर्ता, प्रशासनिक अधिकारी, फ़िल्मकार, लेखक, पत्रकार को मैंने आदिवासी समाज के लिए चिंतन मनन करते देखा है। फ़ेहरिस्त लम्बी है। किंतु अब वो भी एक निश्चित दूरी बना रहे हैं। ‘अरे अभय जी, हम बोलेंगे तो बोलेगा कि ‘ये-ग़ैर आदिवासी’ बोल रहा है।

वर्तमान समाजिक अस्थिरता इस स्तर तक पहुँच गयी है कि, विचार या प्रयास महत्वपूर्ण नहीं रह गया है। विचार या सहयोग देने वाला आदिवासी है या ग़ैर आदिवासी यह महत्वपूर्ण हो गया है। ‘क्या सही है उससे अधिक महत्वपूर्ण कौन सही है, हो गया है?’ ग्रामीण क्षेत्र या फिर शहरी क्षेत्र का आदिवासी समाज अब मुख्य धारा समुदाय का हिस्सा है। गाँव से लेकर उच्च न्यायालय तक जब आप संघर्ष करते हैं, तो ऐसे शुभचिंतकों का सहयोग अनिवार्य हो जाता है। हमारे लिए अधिकार बिना संघर्ष कहाँ संभव है। और जो ‘सहिया’ हमारे लिए संघर्षरत हैं उनको भी एक निश्चित दूरी से हम ‘जोआर’ कर रहे हैं।


लेखक परिचय:
डॉ. अभय सागर मिंज एक अंतर्राष्ट्रीय-स्तर के जाने-माने शिक्षाविद हैं, जो संप्रति डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय (रांची) के मानवशास्त्र विभाग में सहायक प्राध्यापक के तौर पर कार्यरत हैं। आदिवासी समाज को एक नया नजरिया देता उनका यह बहुचर्चित आलेख 13 मई 2022 को प्रभात खबर में प्रकाशित हो चुका है।

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