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आदिवासी समाज में पालकी की परंपरा आज भी बरकरार

हिरणपुर। शादी समाज का एक महत्वपूर्ण संस्कार है और पीढ़ी दर पीढ़ी सभ्य समाज के लोगों को इन परंपराओं से गुजरना होता है। संथाल समाज में बापला (विवाह) में कई तरह के रस्म दिखाई पड़ते हैं। इन्हीं में एक है पालकी (राही)। जिसमें बैठकर दूल्हा, दुल्हन के घर बारात लेकर जाता है। फिर शादी की रस्म पूरी कर उसी पालकी के सहारे दूल्हा दुल्हन को लेकर अपने घर वापस आता है। माना जाता है कि पालकी के बिना शादी का रिवाज ही पूरा नहीं हो सकता। हालांकि आधुनिकता के इस युग में इसका प्रचलन भी आज के समय में कम ही देखने को मिलता है। लोग महंगी गाड़ियों व अन्य माध्यमों से बारात लेकर जाने लगे हैं। जिस कारण से पालकी में मजदूरी का कार्य करने वाले मजदूरों को कम ही काम मिल पाता है। लोगों में परंपरागत चीजों से मोह भंग होता जा रहा है।

भाड़े पर लिया जाता है पालकी…

दूल्हे पक्ष द्वारा पालकी को भाड़े पर लिया जाता है। पालकी को ढोने वाले कहार या मजदूर तय दूरी के हिसाब से रेट तय करते हैं। इनमें इनकी संख्या 6 से 8 होती है। जो बारी-बारी से लंबी दूरी के सफर को पार करते हैं। विवाह पूर्ण होने के बाद दूल्हे के साथ दुल्हन को भी साथ लाना पड़ता है। कहार या मजदूरों को इसमें काफी परिश्रम करना पड़ता है।

क्या है पालकी…

पालकी एक प्रसिद्ध सवारी है, जो सदियों से ही भारतवर्ष में प्रयोग में लाया जाता रहा है। पालकी को शुभ माना जाता है। आदिवासी समाज में भी इसकी एक अलग पहचान है। माना जाता है कि जिसके बिना शादी का रश्म अधूरा है। पालकी में सवार व्यक्ति आराम से बैठता या लेटता है जिसे मज़दूर कंधे पर उठाकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाते हैं।

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