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जंगल की ओर लौटेंगे आदिवासी, तो होगी अतिरिक्त आमदनी

बाग। वर्तमान में बाग क्षेत्र में बहुत कम हुई बारिश ने परंपरागत खेती करने वाले किसानों को मुश्किल में डाल दिया है। हर वर्ष अल्पवर्षा व फसलों पर कीट प्रकोप के चलते लागत मूल्य भी नहीं निकल पाता है। मजबूर होकर आदिवासी किसान गुजरात एवं देश के अन्य राज्यों में रोजगार की तलाश में पलायन कर जाते हैं, ताकि अपनी गृहस्थी चला सके। आदिवासी किसानों के लिए इस वर्ष निंबोली आमदनी का जरिया बनी। ऐसे में किसानों एवं वन विभाग को वर्षों पूर्व बाग क्षेत्र में जंगल से जो आमदनी होती थी, उसी ओर जाना चाहिए। इससे पर्यावरण सुधरेगा और किसानों की अतिरिक्त आमदनी बढ़ेगी।

किसी जमाने में बाग क्षेत्र में बड़े पैमाने पर जंगल था, लेकिन अपने स्वार्थ की खातिर इन जंगलों की बलि ले ली गई। ऐसे में इमली, बेहडा, नीम, सीताफल, आंवला, करंज, धावडा, तेंदुपत्ता, सागवान, आम और महुआ के वृक्ष लगाकर आमदनी जुटानी पड़ेगी। इन पेड़ों से अभी भी बाग क्षेत्र में करोडों की आमदनी हो रही है, लेकिन धीरे-धीरे अब कुछ पेड़ जंगल से कटकर किसान की मेड़ तक ही सीमित रह गए हैं। तेंदुपत्ता से बीडी बनाई जाती है। किसी जमाने में बाग क्षेत्र में इसके पांच हजार पेड़ थे। अब 500-700 रह गए हैं। यही स्थिति सागवान की है। इसका भी क्षेत्र में घना जंगल था, लेकिन अब सागवान सीमित रह गया है।

आयुर्वेद में प्रचुर मात्रा में उपयोग होने वाले धावडा पेड़ से गोंद निकलता है। पहले गोंद क्षेत्र में हजारों क्विंटल से आता था। अब सीमित मात्रा में आठ से दस क्विंटल रह गया है। वर्तमान में गोंद का भाव 400-500 रुपये किलो है। इसी तरह करंज के पेड़ से भी बीजी निकलती थी। इसकी बीजी से तेल निकलता था। यह पेड़ भी अब गिने-चुने रह गए हैं। देशी आम के पेड़ भी बहुतायत में थे, लेकिन इनकी संख्या भी सीमित हो गई है। आम का पेड़ किसान को 10 हजार रुपये से अधिक आमदनी देता है। सीताफल भी आमदनी का बड़ा जरिया है। बगैर पानी से भी यह फल बड़ा होता है और वर्ष में एक बार फसल देता है।

वर्तमान में इमली, नीम और जंगली तुलसी ने जिस तरह से बाग क्षेत्र में किसानों को मालामाल किया। यदि किसान जागरूक हो जाए, तो वनों के माध्यम से अपनी आर्थिक स्थिति सुधार सकते हैं। वर्तमान में देशी बबूल की जगह बिलायती बबूल के पेड़ों ने क्षेत्र में अपने पैर पसार लिए हैं। जबकि देशी बबूल भी बाग, कुक्षी एवं लोंगसरी क्षेत्र में आमदनी का बड़ा स्त्रोत है। इसकी फसल क्षेत्र में 40 लाख के आसपास आती है। देशी बबूल भी जंगल से विलुप्त हो रहा है। इसके भी पौधे लगाकर आमदनी का अच्छा जरिया उत्पन्ना हो सकता है। इसकी फली और इसका बीज आयुर्वेद में घुटने के इलाज के लिए बड़ी कारगार है। अब वर्तमान में सरकार को जनजागृति के माध्यम से इन वृक्षों को फिर से प्रोत्साहन देना चाहिए। इसे किसान की मेड़ पर भी लगा देना चाहिए, जिससे किसानों की माली हालत सुधर जाएगी। हालांकि इस वर्ष जिस तरह से नीम के पेड़ ने जो आमदनी दी है, उससे किसान जागरूक होगा एवं पेड़ों का संरक्षण करेगा।

वन संरक्षण के लिए लोगों को आगे आना चाहिए

वन अधिकारी संतोष चौहान ने बताया कि वनों का संरक्षण करना वन विभाग का तो कर्तव्य है ही, पर अब लोगों को भी आगे आना चाहिए। आमदनी देने वाले पेड़ लगाकर जंगल को सुधारा जा सकता है। वर्तमान में मालवा के मुकाबले बाग क्षेत्र में जलस्तर अभी भी अच्छा है। एक बार यदि पौधा गति पकड़ लेता है, तो वृक्ष का रूप धारण कर लेता है, लेकिन शिक्षा के अभाव में पशुओं को जंगल में चराने के लिए छोड़ देते हैं। इससे पौधे वृक्ष का रूप नहीं ले पाते। (नई दुनिया)

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