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छत्तीसगढ़ का आदिवासी समाज, बोधघाट परियोजना और कांग्रेस सरकार के ढाई साल

बस्तर के ककनार गांव के चैतराम इस बात से नाराज़ हैं कि आदिवासियों के विरोध के बाद भी राज्य सरकार बार-बार बस्तर में बोधघाट इंदिरा सरोवर जल विद्युत परियोजना को हर हाल में बनाने का दावा कर रही है। चैतराम कहते हैं, “बस्तर पांचवीं अनुसूची का क्षेत्र है लेकिन ग्राम सभा से कोई पूछने वाला नहीं है। रायपुर में बैठे-बैठे नेता और अधिकारी अपना फ़ैसला हम पर थोप रहे हैं।”

चैतराम का गांव ककनार, बस्तर के उन 42 गांवों में शामिल है, जिनके बारे में कहा जा रहा है कि अगर बोधघाट सिंचाई और बिजली परियोजना का काम शुरु हुआ तो ये गांव डूब जाएंगे। अविभाजित मध्यप्रदेश की 42 साल पुरानी इंद्रावती नदी पर, बारसूर इलाके में बनाये जाने वाले बोधघाट इंदिरा सरोवर जल विद्युत परियोजना की नींव 1979 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने रखी थी।

इस योजना के तहत 125 मेगावॉट बिजली उत्पादन की चार इकाइयों की स्थापना की जानी थी। लेकिन पर्यावरण और पारिस्थितिकी का हवाला दे कर इस जल विद्युत परियोजना को 1994 में रद्द कर दिया गया था। अब राज्य की कांग्रेस पार्टी की सरकार ने फिर से इस परियोजना पर काम शुरु किया है। लेकिन इस परियोजना के ख़िलाफ़ विरोध के स्वर तेज़ होते जा रहे हैं।

छत्तीसगढ़ में सर्व आदिवासी समाज के अध्यक्ष और पूर्व सांसद सोहन पोटाई इसी बस्तर इलाके से हैं। बोधघाट परियोजना को फिर से शुरु किये जाने को लेकर वे सरकार से बेहद नाराज़ हैं।

उन्होंने मोंगाबे-हिंदी से कहा, “ये सवाल आज का नहीं है। हम बस्तर के आदिवासी तो शुरु से इस परियोजना का विरोध करते आये हैं। आज हमारे विरोध पर क्यों सवाल उठाया जा रहा है? हम पांचवीं अनुसूची के इलाके में हैं और कोई हमसे हमारा अधिकार नहीं छीन सकता। बोधघाट को किसी भी हालत में सरकार को बंद करना ही होगा।”

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और भविष्य के दावे पर सवाल
जब 1979 में इस परियोजना की आधारशीला रखी गई थी, तब इस योजना के तहत 125 मेगावॉट बिजली उत्पादन की चार इकाइयों की स्थापना की जानी थी। 90 मीटर की ऊंची बांध वाली इस परियोजना में 13783.147 हेक्टेयर ज़मीन डूब क्षेत्र में आने वाली थी। इसमें 5704.332 हेक्टेयर घने जंगलों वाला इलाका था।

इस परियोजना की पर्यावरणीय स्वीकृति जनवरी 1979 और उसके बाद फरवरी 1985 में दी गई थी। लेकिन आदिवासियों और पर्यावरणविदों के विरोध के बाद इस परियोजना से होने वाले नुकसान के लिए 1987 में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के सचिव की अध्यक्षता में एक जांच समिति का गठन किया गया। इसके अलावा 1989 में भारतीय वन्यजीव संस्थान को भी इसकी जांच का जिम्मा सौंपा गया।

दोनों ही जांच रिपोर्ट में पर्यावरण और पारिस्थितिकी पर प्रतिकूल असर पड़ने का हवाला दिया गया था। यही कारण है कि 1994 में परियोजना को वन स्वीकृति देने से मना कर दिया गया।

पर दुनिया भर में बड़े बांध व सिंचाई परियोजनाओं की उपयोगिता और उसके ख़तरे को लेकर चल रही बहसों के बीच पिछले साल के बजट में, छत्तीसगढ़ सरकार ने बस्तर में बोधघाट परियोजना के निर्माण कार्य को फिर से शुरु करने की घोषणा की। इसकी सर्वाधिक प्रतिक्रिया स्वाभाविक रुप से बस्तर से ही सामने आई। कई जन- संगठनों और आदिवासी नेताओं ने इस योजना का विरोध किया।

लेकिन इस तरह की तमाम प्रतिक्रियाओं को अनदेखा करते हुए मई में मंत्रिपरिषद की बैठक में बोधघाट बहुउद्देशीय परियोजना के सर्वेक्षण, अन्वेषण और डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करने के प्रस्ताव का अनुमोदन किया गया। योजना की रफ़्तार का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि मंत्रीपरिषद की मुहर के दस दिनों के भीतर ही केंद्रीय जल आयोग ने इस योजना को अपनी सैद्धांतिक सहमति भी प्रदान कर दी और अगले दस दिनों में इसके सर्वेक्षण के लिए 41.54 करोड़ रुपये भी स्वीकृत कर दिए गये।

उसके बाद राज्य भर में इस परियोजना को एक महान परिवर्तनकारी योजना की तरह प्रचारित करने की कोशिश शुरु हुई। हर दिन औसतन 44 लाख रुपये विज्ञापनों पर खर्च करने वाली छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा मीडिया में विज्ञापन जारी करने का सिलसिला शुरु हुआ और रातों-रात चौक-चौराहों पर इस परियोजना के होर्डिंग लगा दिए गये। परियोजना के लाभ गिनाने वाली किताबें छापी और बांटी गईं।

राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का दावा है कि 40 वर्षों से लंबित इस प्रोजेक्ट को बस्तर की खुशहाली को ध्यान में रखते हुए नए सिरे से तैयार किया किया गया है और दंतेवाड़ा, बीजापुर और सुकमा जिलों में नहरों के माध्यम से तीन लाख 66 हजार 580 हेक्टेयर में सिंचाई के लिए जलापूर्ति होगी। राज्य सरकार के अनुसार बोधघाट परियोजना के निर्माण से बस्तर की अर्थव्यवस्था में 6 हजार 223 करोड़ रूपए की बढ़ोत्तरी होगी।

लेकिन इस तरह के तमाम दावे और प्रचार सामग्री, होर्डिंग व मीडिया के बयानों से इतर, इस साल जब 26 फरवरी को विधानसभा में विपक्षी दल के विधायक बृजमोहन अग्रवाल के अतारांकित प्रश्नों के तौर पर इस परियोजना से विस्थापन, डुबान और कमांड एरिया से जुड़ा सवाल पूछा गया तो राज्य के कृषि मंत्री रविंद्र चौबे ने सर्वेक्षण कार्य पूरा नहीं होने का हवाला देते हुए हाथ खड़े कर दिए।

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री और बस्तर के वरिष्ठ आदिवासी कांग्रेसी नेता अरविंद नेताम ने मोंगाबे-हिंदी से कहा, “सरकार के दावे हवा-हवाई हैं। संकट ये है कि बिना किसी ज़मीनी सर्वेक्षण के सरकारी अधिकारियों ने रायपुर में बैठ कर पूरी योजना के फर्ज़ी आंकड़े बना लिए और उसे प्रचारित करना शुरु कर दिया। जब सर्वेक्षण ही नहीं हुआ तो सरकार के पास ये आंकड़े कहां से आए?”

सरकार के इस निर्णय पर सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर का कहना है कि बोधघाट परियोजना को फिर से शुरु करने का निर्णय सही नहीं है। पाटकर कहती हैं, “40 साल से रद्द विनाशकारी बोधघाट डैम बांध को पुनर्जीवित करने की केंद्रीय जल आयोग और छत्तीसगढ़ सरकार की योजना की, लागत लाभ विश्लेषण, पांचवीं अनुसूची के क्षेत्र बस्तर के आदिवासियों के विस्थापन और अपरिवर्तनीय पर्यावरणीय प्रभावों के दृष्टिकोण से तत्काल समीक्षा की जानी चाहिये।”

पूर्व मंत्री और कांग्रेस नेता अरविंद नेताम बार-बार दुहराते हैं कि पिछले कुछ सालों से छत्तीसगढ़ में आदिवासियों से जुड़े सवाल लगातार हाशिये पर धकेले जाते रहे हैं और सरकार की चिंता में आदिवासी हैं ही नहीं।

कांग्रेस सरकार के ढाई साल और हाशिये पर आदिवासी
असल में पिछले कुछ महीनों में सरगुजा से लेकर बस्तर तक आदिवासियों के लगातार विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। चुनाव से पहले आदिवासियों से जो वादा कांग्रेस पार्टी ने किया था, सत्ता में आने के बाद अब कांग्रेस पार्टी की सरकार के सुर बदल गये हैं।

बीजापुर के सिलगेर इलाके में सुरक्षाबलों के कैंप के ख़िलाफ़ प्रदर्शन जारी है। पुलिस की गोली से तीन आदिवासियों और भगदड़ में एक गर्भवती महिला की मौत के बाद भी, पिछले तीन महीने से आदिवासी सड़कों पर हैं। कैंपों के अलावा खनन कंपनियों के ख़िलाफ़ भी आदिवासियों ने हज़ारों की संख्या में एकत्र हो कर कई-कई दिनों तक विरोध प्रदर्शन किया है और सरकार को अपने फ़ैसले को टालने पर मज़बूर होना पड़ा है।

राज्य में कांग्रेस पार्टी की सरकार आने के कुछ महीनों के बाद ही बैलाडीला के नंदराज पर्वत के लौह अयस्क को नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन को खनन के लिए दिए जाने के ख़िलाफ़ हज़ारों आदिवासी सड़कों पर उतर आये थे। उनका आरोप था कि फर्ज़ी ग्राम सभा के दस्तावेज़ के सहारे उनके देवताओं के पहाड़ को खनन के लिए दिया गया है। जांच के बाद सरकार ने माना कि कोई ग्रामसभा नहीं हुई थी।

रायपुर में हसदेव अरण्य में कोयला खनन के खिलाफ सामाजिक कार्यकर्ताओं का प्रदर्शन। जो पार्टी चुनाव के पहले आदिवासियों के हित को समझने का दावा कर रही थी उसके हाल के कई फैसले और उसका विरोध यह दर्शाता है कि आमजन इनसे संतुष्ट नहीं है। तस्वीर: छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलनइसके बाद 6 मार्च 2020 को वन विभाग के उप सचिव ने नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन को पत्र लिख कर इस खनन परियोजना की पर्यावरण स्वीकृति को रद्द करने की बात कही। हालांकि यह मामला अभी भी कागज़ी कार्यवाहियों में उलझा हुआ है।

इसी तरह नारायणपुर के आमदेई पहाड़ को खनन के लिए दिए जाने के ख़िलाफ़ भी पिछले दो सालों में कई बार आदिवासी समय-समय पर सड़कों पर उतरे हैं।

सत्ता में आते ही सोनाखान-बाघमाड़ा में वेदांता को आवंटित स्वर्ण भंडार की लीज पर भूपेश बघेल ने यह कहते हुए रोक लगा दी थी कि इस इलाके में आदिवासियों का विरोध है। इसके अलावा यह इलाका 1857 के अमर शहीद वीरनारायण सिंह का इलाका है और उनकी स्मृतियां यहां से जुड़ी हुई हैं। मुख्यमंत्री ने इसे अनमोल धरोहर बताया था। सरकार के इस फ़ैसले को लेकर सोनाखान के आदिवासियों ने मुख्यमंत्री को सम्मानित भी किया। लगभग साल भर बाद मुख्यमंत्री ने सोनाखान पहुंच कर वीरनारायण सिंह की स्मृति में उस इलाके को पर्यटन स्थल के तौर पर विकसित करने की घोषणा की। लेकिन अब खनन प्रक्रिया फिर से शुरु हो गई है।

शीर्ष नेताओं का चुनावी बयान और जमीनी वास्तविकता
सरगुजा और कोरबा में ग्राम सभा के विरोध के बाद भी कोयला खदानों के आवंटन को लेकर दो-दो महीनों से अधिक के आंदोलन हो चुके हैं। इन इलाकों में हर महीने किसी न किसी कोयला खदान के लिए होने वाले भूमि अधिग्रहण को लेकर आदिवासी सड़कों पर उतर रहे हैं।

ये वही इलाका है, जहां चुनाव से पहले राहुल गांधी और तब राज्य में कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष भूपेश बघेल ने सभा करते हुए कोयला खदानों के लिए जंगलों के विनाश और आदिवासियों के विस्थापन को लेकर सवाल खड़ा करते हुए आदिवासियों से वादा किया था कि इस इलाके में आदिवासियों की मर्जी के बिना खनन को मंजूरी नहीं दी जाएगी।

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जब विपक्ष में थे, तब उनके कुछ ट्वीट गौरतलब हैं- ‘यदि जनता नहीं चाहती कि कोल ब्लॉक किसी निजी कंपनी को दी जाए तो सरकार को इसे मानना चाहिए। जनता को क्यों नहीं सौंपा जा सकता कोयला खदान?‘, ‘रायगढ़ के तमनार में आज 56 गांवों के किसान कोयला खदान के लिए गांवों को उजाड़े जाने का विरोध करने के लिए एकत्रित होंगे। कांग्रेस उनके साथ है।’, ‘अडानी का महाघोटाला छत्तीसगढ़ और राजस्थान की भाजपा सरकार की मिलीभगत और मोदी सरकार के संरक्षण में। हसदेव नदी के जलग्रहण क्षेत्र में जंगल काटकर अडानी को अरबों का लाभ। जांजगीर और कोरबा जिले में भविष्य में होगी पानी की कमी। आदिवासी और हाथियों के बीच संघर्ष में वृद्धि।’

लेकिन सत्ता में आने के बाद यह वादे हवा हो गये और भूपेश बघेल की सरकार ने भी पुरानी सरकार की तर्ज पर इस इलाके में काम करना शुरु कर दिया।

पिछले कुछ महीनों से हसदेव अरण्य के इलाके में चार नये कोयला खदानों के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरु है। चकित करने वाली बात ये है कि 2013 में नया भूमि अधिग्रहण कानून आने के बाद भी, राज्य सरकार 1957 के कोल बेयरिंग क़ानून के तहत भूमि अधिग्रहण कर रही है। इस तरह के अधिग्रहण पर छत्तीसगढ़ सरकार ने जनवरी 2021 में कोयला मंत्रालय में आपत्ति भी दर्ज की थी। लेकिन अब छत्तीसगढ़ सरकार ख़ुद कोल बेयरिंग एक्ट में भूमि अधिग्रहण कर रही है।

हालांकि तमाम विरोध के बाद भी जब आदिवासियों की बात नहीं सुनी गई तो आदिवासियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर करते हुए इस अधिग्रहण को रद्द करने की मांग की है।

कांग्रेस सरकार में ही राज्य के महाधिवक्ता रहे संविधान विशेषज्ञ कनक तिवारी कहते हैं-“सरकार अपनी मर्जी से क़ानून की गलत-सलत व्याख्या करके उसका दुरुपयोग करती है और ग़रीब आदिवासियों की आवाज़ दम तोड़ देती है। पुराने क़ानून पर हमेशा नये क़ानून के प्रावधान लागू होंगे, इतनी-सी बात सरकार को क्यों नहीं समझ में आती?”

सरगुजा ज़िले के परसा इस्ट केते बासन में तो एक निजी कंपनी ने कोयला खनन के लिए 32 आदिवासियों की वनाधिकार पत्रक की ज़मीनों को भी ख़रीदने का दावा किया। जबकि वनाधिकार मान्यता कानून के तहत मिली ज़मीनों की ख़रीद-बिक्री नहीं की जा सकती। आदिवासियों ने मामले की शिकायत की तो कलेक्टर ने जांच समिति बनाई और अगस्त 2020 में जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए स्वीकार किया कि आदिवासियों की ज़मीन ख़रीदी ग़ैरक़ानूनी है। लेकिन राज्य सरकार ने अब तक इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की है। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि मामला प्रक्रियाधीन है।

आदिवासियों को लेकर पिछली सरकार और वर्तमान सरकार के रवैये में कोई फर्क है कि नहीं, इसपर छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के आलोक शुक्ला कहते हैं, “मुझे नहीं लगता कि आदिवासियों के जंगल, जमीन आजीविका, संस्कृति और उनके संवैधानिक अधिकारों रक्षा के लिए नीतियों में कोई विशेष बदलाव पिछली सरकार से इस सरकार में भिन्न है। कोयले से लेकर आयरन और तक खनिज संसाधन बिना ग्रामसभाओं की सहमति के आज भी कंपनियों को सौंपे जा है हैं। पांचवी अनुसूची और पेसा कानून के आज भी उल्लंघन यथावत हैं। यहां तक कि ऐतिहासिक वनाधिकार मान्यता कानून का क्रियान्वयन भी उस स्वरूप में नहीं हो सका जिसका वादा कांग्रेस ने चुनाव पूर्व किया था।” (साभार: मोंगाबे)

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